मन समर्पित तन समर्पित और यह जीवन समर्पित...कविता-
सीजीनेट के साथी ओमकार मरकाम एक कविता सुना रहे हैं :
मन समर्पित तन समर्पित-
मन समर्पित तन समर्पित और यह जीवन समर्पित-
चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूँ-
माँ तुम्हारा ऋण बहुत है मैं अकिंचन-
किन्तु इतना कर रहा फिर भी निवेदन-
थाल में लाऊँ सजाकर भाल जब-
स्वीकार कर लेना दयाकर यह समर्पण-
गान अर्पित प्राण अर्पित रक्त का कण-कण समर्पित...
Posted on: May 13, 2019. Tags: CG OMKAR MARKAM POEM SONG VICTIMS REGISTER
कोई नहीं पराया मेरा घर सारा संसार है...कविता-
ग्राम-सिंगपुर, तहसील-पंडरिया, जिला-कबीरधाम (छत्तीसगढ़) से ओमकार मरकाम एक कविता सुना रहे हैं :
कोई नहीं पराया मेरा घर सारा संसार है-
मै न बंधा हूँ देश काल की जग लगी जंजीर में-
मै न खड़ा हूँ जात पात, उंच-नीच की भीड़ में-
मेरा धर्म न कुछ, स्याही शब्दो का गुलाम है-
मै बस कहता हूं कि प्यार है तो घट-घट में राम है-
मुझमे तुम न कहो मंदिर मस्जिद पर सर मै टेक दूं-
मेरा तो आराध्य आदमी देवाल्य हर द्वार है...
Posted on: May 13, 2019. Tags: CG KABIRDHAM OMKAR MARKAM POEM SONG VICTIMS REGISTER
चौमास के पानी परागे, जाना माना अकास हर...छत्तीसगढ़ी गीत-
ग्राम-सिंगपुर, तहसील-पंडरिया, जिला-कबीरधाम (छत्तीसगढ़) से ओमकार मरकाम एक छत्तीसगढ़ी गीत सुना रहे हैं :
चौमास के पानी परागे, जाना माना अकास हर-
साउर सहित हर आगे-
जग जग ले चंदा उठे, बादर भईगे फरिहर-
खिरखी माता चारो खुटले दिखथे हरियर-हरियर-
रिगाबी ले आज अन्नपूर्णा हर-
खेतन खेत मा छागे...
Posted on: May 13, 2019. Tags: CG KABIRDHAM OMKAR MARKAM SONG VICTIMS REGISTER
ये ऋतुएँ कितनी प्यारी, आहा कितनी न्यारी हैं...बाल कविता-
ग्राम-सिंगपुर, तहसील-पंडरिया, जिला-कबीरधाम (छत्तीसगढ़) से कक्षा पांचवी का छात्र ओमकार एक बाल कविता सुना रहा है :
ये ऋतुएँ कितनी प्यारी, आहा कितनी न्यारी हैं-
वर्षा आती पानी लाती, धरती हरी भरी हो जाती-
खुश हो जाते सभी किसान, खेतो में लहराते धन-
पकते धान दिवाली आती, खूब सब्जियां ठण्ड खिलाती-
स्वेटर पहने तापे आग, गाँव-गाँव में होती फाग-
फिर आते गर्मी के दिन, मिले चैन न पानी बिन...
Posted on: Sep 18, 2018. Tags: CG KABIRDHAM OMKAR KUMAR MARKAM PANDARIYA POEM SONG VICTIMS REGISTER
चीटी ने हाथी से कहा, हाथी दादा जमाना बदल गया है, हाथी ने सूंड उठाकर हामी भरी: कहानी
ग्राम-सिंगपुर, तहसील-पंडरिया, जिला-कबीरधाम (छत्तीसगढ़) से ओमकार मरकाम चीटी और हाथी की कहानी सुना रहे है, एक रानी चीटी थी वह रोज भोजन की तलाश में जंगल जाती थी सभी चीटियाँ उस चीटी के साथ जाती | उस जंगल में एक हाथी रहता था| वह दिनभर घूमते रहता था| कभी इस पेड़ को तोड़ता कभी उस पेड़ को तोड़ता, कुछ खाता कुछ फेक देता सूंड में पानी भरता और नहाता दूसरे जानवरों को पानी से भिगोता, जानवरों से धक्का मुक्की भी करता, चीटियों को मसल देता, सभी उससे डरते थे| उससे कोई कुछ न कहता, हाथी से सभी तंग थे | एक दिन की बात है रानी चीटी हाथी से मिली वह बोली तुम दूसरो को सताते हो | यह ठीक नहीं, हाथी बोला चुप रह छोटी से जान बित्ता भर जुबान मेरी मर्जी मैं चाहूँ जो करूँ. रानी चीटी बोली शेर जी कह दूंगी. हाथी हंसकर बोला शेर से क्या कहोगी वह मेरे दम पर मुखिया है| रानी चीटी चुप हो गई वह घास में जाकर छिप गई | हाथी इधर उधर घूम रहा था रानी चीटी चुपके से उसके सूंड में घुस गई | हाथी अपनी मौज में था चीटी सूंड के अन्दर घुसती ही गई| अब रानी चीटी ने हाथी की सूंड को काटना शुरू किया हाथी परेशान होने लगा उसने जोर-जोर से सूंड पटकी फूंक लगाईं कोई जुगत काम न आई रानी चीटी ने काटना बंद नहीं किया | तब रानी चीटी बोली अब आया मजा बच्चू अब क्यूँ रोते हो आई नानी याद? रानी चीटी हाथी को काटती रही. हाथी गिर पड़ा बोला चीटी रानी माफ़ करो-माफ़ करो. अब किसी को नहीं सताऊंगा. किसी को छोटा न मानूंगा रानी चीटी ने सोचा हाथी को अब आई अकल. रानी चीटी सूंड से बाहर आई बोली हाथी दादा, हाथी दादा जमाना बदल गया है हाथी ने सूंड उठाकर हामी भरी | ओमकार मरकाम@9575248234.

