सारी उम्मीदों पे मातम छाया...किसानों पर एक कविता
कानपुर, उत्तर प्रदेश से के.एम. भाई किसानों की बदहाली व सरकार के रवैये पर एक कविता प्रस्तुत कर रहे हैं:
सारी उम्मीदों पे मातम छाया !
आसमां में रौशनी छाई थी-
और जमीं पे ना जाने कितनी हरियाली-
शायद वो पूर्णिमा की रात थी-
चाँद की रौशनी ने जमीं पे एक सपना सजाया था-
भूखे किसानों को ख़ुशी के आगोश में सुलाया था-
ना जाने क्या-क्या उम्मीद जगी थी-
ढोल-नगाड़े संग पूड़ी की थाल सजी थी-
सहनाई भी बजेगी और बेटी की डोली भी उठेगी-
घर की चौखट पर खुशहाली की किरण दिखेगी-
हमारे घर भी दिवाली और होली मनेगी-
पर कुदरत ने ये कैसा कहर बरपाया-
सारी उम्मीदों पे मातम छाया...
