हवा देश की देश का फल सरस बने प्रभु सरस बने...कविता
बवाना दिल्ली से इन्दर एक कविता सुना रहे हैं:
देश की माटी देश का जल,हवा देश की देश का फल-
हवा देश की देश का फल-
सरस बने प्रभु सरस बने-
देश के वन और देश के बाट-
देश का घर और देश का घाट-
सरल बने प्रभु सरल बने-
देश के तन और देश के मन-
देश के घर के भाई बहन,विमल बने प्रभु विमल बने...(AR)
