नवा जबान के मनखे वो काबर मारथो लबारी... छत्तीसगढ़ी कविता-
राजनांदगांव (छत्तीसगढ़) से वीरेन्द्र गंधर्व एक कविता सुना रहें है:
नवा जबान के मनखे वो काबर मारथो लबारी-
घर माँ बठकी नी हवे अब होथे लोटा खारी-
खा थो चौमिन मैगी पास्ता बारो मासी-
बता थो नॉन चटनी बोरा बासी-
बिवाह के पहली आज कल के-
टूरा-टुरी मन हा कंधा मा कंधा जोड़े-
नवा जबान के मनखे वो काबर मारथो लबारी...(183227) GT
