"संकल्पित हो रही जवानी माँ की पीड़ा हरने को"...
सुरेश कुमार बड़वानी, मध्यप्रदेश से “संकल्पित हो रही है जवानी” के विषय में बता रहे हैं:-”संकल्पित हो रही जवानी माँ की पीड़ा हरने को, निकली संगठित करके दुष्ट व्यक्ति से लड़ने को, विश्व राष्ट्र व विश्व शांति का चिंतन जिसको खलता है, इन्हें विश्व बंधुत्व निभाता नफरथ का विष पलता है, जो आतंकवाद हानि वस्तुतः उन्हें कुचलने को, संकल्पित हो रही जवानी माँ की पीड़ा हरने को| कट्टरता नफरथ फैलाती है, भ्रष्टा मन्त्र रचाती है, समता ममता राष्ट्र भक्ति की चर्चा उजेला भाती है उसमें स्वार्थी अरुणावाद की कट्टरता से धरने को, संकल्पित हो रही जवानी माँ की पीड़ा हरने को, दुनिया पर हावी होने का चढ़ा हुआ जूनून जिनको, खून ख़राबा कट करने में दर्द नहीं होता जिनको, मचल उठी है उन्हें जवानी पैरों तले मसलने को, संकल्पित हो रही जवानी माँ की पीड़ा हरने को| प्राणी मात्र से प्यार निभाता निर्मल वस्तु बहाते हैं, अपनी स्वार्थ सिधी के खातिर अरे कहर बरसाते हैं, कफ़न बांधकर चली जवानी उन्हें दफ़न करने को, संकल्पित हो रही जवानी माँ की पीड़ा हरने को ||
