मत निकल, मत निकल, मत निकल...कविता-
मालीघाट, मुजफ्फरपुर (बिहार) से सुनील कुमार महान कवि डॉ. हरिवंशराय बच्चन की कविता “मत निकल, मत निकल, मत निकल” सुना रहे हैं:
शत्रु ये अदृश्य है, विनाश इसका लक्ष्य है-
कर न भूल, तू जरा भी ना फिसल-
मत निकल, मत निकल, मत निकल-
हिला रखा है विश्व को, रुला रखा है विश्व को-
फूंक कर बढ़ा कदम, जरा संभल-
मत निकल, मत निकल, मत निकल-
उठा जो एक गलत कदम, कितनों का घुटेगा दम-
तेरी जरा सी भूल से, देश जाएगा दहल-
मत निकल, मत निकल, मत निकल-
संतुलित व्यवहार कर, बन्द तू किवाड़ कर-
घर में बैठ, इतना भी तू ना मचल-
मत निकल, मत निकल, मत निकल...
