वाह रे जनतंत्र, वाह रे जनतंत्र...कविता
कानपूर (उत्तरप्रदेश) से के एम भाई शिक्षक दिवस के उपलक्ष्य में एक कविता सुना रहे हैं :
वाह रे जनतंत्र, वाह रे जनतंत्र-
भैस की पूंछ पकड़कर-
चलने की आदत हो गई-
अब तो जीत भी लोकतंत्र पर-
आफत हो गई-
अभी-अभी पता चला कि-
अभी वो तितुर से गुलाम हो गई है-
चलो एक बार फिर से-
दुनिया बहाल हो गई है-
अब तो झंडे नारे की दूकान-
फिर से खुशहाल हो गई है...
