आदिवासी संस्कृति में दारु पीने का नहीं बल्कि देवी देवताओ को चढाने का रिवाज है...(गोंडी)
ग्राम लाम्कंहार, तहसील अंतागढ़, जिला कांकेर,छत्तीसगढ़ से विश्राम गावड़े बता रहे हैं, दारु पीना आदिवासी संस्कृति में नहीं है लेकिन जो महुआ का फूल और छिलका को भिगो करके प्रकृति को अर्पण करते हैं|आदिवासी तो इसका व्यवसाय भी नहीं करते हैं |आदिवासी इसे इकठ्ठा करके रखे रहते थे और शादी,तीज,तिहार,जतरा में उपयोग करते थे और भूखमरी के लिए भी इसका उपयोग करते थे|लोग कहते हैं दारु से आदिवासी का विकास नहीं हो रहा है तो मैं शासन,प्रशासन से कहना चाहता हूँ कि जितने भी सरकारी शराब दूकान, भट्टी हैं उन्हें बंद किया जाए|क्योंकि इस से कई गाँव खाली हो चुके हैं आजकल गाँव में कोई युवा नहीं मिलेंगे अगर कोई हो भी तो उसे नक्सल बताकर गोली मार दिया जाता है |
