समाजवाद का खेल...कविता
कानपुर उत्तरप्रदेश से के एम भाई एक कविता सुना रहे हैं:
कभी चाचा फेल हैं तो-
कभी बऊआ फेल है-
नेताजी की क्लास में-
परिवारवाद का फेम है-
कोई गाय मांगे तो-
कोई भैंस का फैन है-
कुर्सी की लड़ाई में-
आज परिवार केंद्र है-
न विकास न सुधार-
यहाँ कोई तीसरा गेंद है-
सत्ता के मैदान में-
यह सब भईया-
समाजवाद का खेल है-
समाजवाद का खेल है...
