वनांचल स्वर: सर्पदंश का आसन और असरकारी ईलाज...
ग्राम- हिटारकसा, ब्लॉक-भानुप्रतापपुर, जिला-उत्तर बस्तर कांकेर (छत्तीसगढ़) से वीर सिंह पटेल बता रहे हैं कि उन्होंने अपने बेटे को सांप के द्वारा काटे जाने का इलाज सिखा दिया है। उनका इलाज करने का तरीका काफी सरल है। वह केले के छिलके को कूटने के बाद उसका रस निकाल देते हैं और पीड़ित को पिला देते हैं। केले के छिलके का रस सांप के जहर को काट देता है। वह अब तक इस प्रयोग से बहुत लोगों का इलाज कर चुके हैं।
Posted on: Feb 16, 2021. Tags: CG KANKER VANANCHAL SWARA VEER SINGH
निवासियों से खेती पर चर्चा
चेहरी पारा, ग्राम पंचायत-सरंडी, ब्लाक-अंतागढ़, जिला-कांकेर (छत्तीसगढ़) से बाबूलाल गाँव के निवासियों से खेती पर चर्चा कर रहे हैं, निवासी रविशंकर बघेल बता रहे हैं लोग खेती में धान, कोदो, कुटकी, कुल्थी उगाते हैं| पुराने समय के जो फसल है उसकी खेती अब कम हो गयी है लोग सरकरी बीजो का उपयोग करने लगे हैं| खेती से लोगो को खाने के लिये पर्याप्त फसल मिल जाता है| गाँव में पानी की सुविधा नहीं होती है| जिसके कारण गर्मी के दिनों में फसल नहीं उगा पाते हैं|
Posted on: Feb 16, 2021. Tags: BABULAL NETI CG KANKER STORY
धरती दाई के सपूत बेटा...छत्तीसगढ़ी गीत-
जिला-मुंगेली (छत्तीसगढ़) से मुकेश राजपूत छत्तीसगढ़ी गीत सुना रहे हैं:
धरती दाई के सपूत बेटा-
हावन नेचर से अड़ीहा-
कईथे गा मोला छात्तिसगढ़िहा-
हवन गा सबले बढिहा-
कर्मा,ददरिया,सुआ,पंक्षी-
इहाँ के पहचान-
धान के कटोरा कईथे,येखर छत्तीसगढ़ हे नाम...(AR)
Posted on: Feb 15, 2021. Tags: CG SONG
वनांचल स्वर: इनकी ग्राम पंचायत में कोई भी आश्रित ग्राम नहीं है-
ग्राम-धनेलीकन्हार, तहसील-कोरर, जिला-कांकेर (छत्तीसगढ़) से वीरेंद्र कुमार बताते हैं कि उनके गांव से सभी लोग जंगल पर आश्रित हैं। इनकी ग्राम पंचायत में कोई भी आश्रित ग्राम नहीं है।
उनके गांव में हलबा और गोंड जनजाति के लोग रहते हैं। संपर्क@8839492918. (185603) GT
Posted on: Feb 14, 2021. Tags: CG KANKER VANANCHAL SWARA VIRENDRA KUMAR
वनांचल स्वर- लॉकडाउन में दिया वन ने साथ...
ग्राम-चाहचड़, तहसील-दुर्गुकोंद्ल, जिला-कांकेर (छत्तीसगढ़) से संतराम सलाम बताते हैं कि लॉकडाउन के समय जीवनयापन करना मुश्किल था, भोजन उपलब्ध नहीं था बहुत तकलीफ थी। महुआ ही था उसी से दो तीन प्रकार की चीज़ जैसे लाटा भूंज, और सब्जी बनाकर उसमें सरई का बीज डालते थे। जब महुआ खत्म होने लगा तब कोलियारी, हवाली भाजी, खट्टा भाजी बनाया जाता था। जब नमक, मिर्च खत्म होने लगा तब व्यापारी से बात करके गांव में उपलब्ध करवाया गया। हम लोगों ने हर्रा, बेहड़ा खाया और काफी सारे बच भी गया था, तब हमने व्यापारियों को गांव बुलाकर बेच दिया। हमें जो पैसे मील थे उनसे हमने जरूरत का सामान खरीदा। हम लोग जंगल से भाजी, चेरोटा, करोल, बांस और कढ़ी का छोटा छोटा पौधा लेकर आए।
संपर्क@7647070617. (185579) GT
