कहाँ जाऊं राली नोनी केकड़ा दरुकला...गोंडी पारम्परिक गीत -
ग्राम-कौंदखेडा, ब्लाक-विश्रामपुर, जिला-कोंडागाँव (छत्तीसगढ़) से कामता प्रसाद एक पारम्परिक गोंडी गीत सुना रहे है:
कहाँ जाऊं राली नोनी केकड़ा दरुकला-
आगि बारुं रसेली की केकड़ा बुन्जुग ला-
साय सेला रे रे रेला रे रेला साय सेला रे रेला-
नाचूं न रेली नोनी करली पुल सिकली हो-
बड़े जानी रोलिस नोनी बार-बार सिकली...
Posted on: Dec 21, 2017. Tags: KAMTA PRASAD SONG VICTIMS REGISTER
अनुता कोड की बनुता हिरी...हल्बी विवाह गीत -
ग्राम-चौड़ी, ब्लाक-चारामा, जिला-कांकेर (छत्तीसगढ़) से कामता प्रसाद एक हल्बी विवाह गीत सुना रहे है:
अनुता कोड की बनुता हिरी-
पानी जावा झिरी, झिरी रे-
मेनेजर देय जा तोरो लाल गमचा-
तोरो खानदो पड़ी गेला दुचर-
लगेर लगेर लगेर लगेर-
Posted on: Dec 21, 2017. Tags: KAMTA PRASAD SONG VICTIMS REGISTER
रंगबत्ती-रंगबत्ती-रंगबत्ती-रंगबत्ती...उड़िया गीत =
ग्राम-चौड़ी, तहसील-चारामा, जिला-कांकेर (छत्तीसगढ़) से कामता प्रसाद एक उड़िया विवाह गीत सुना रहे है:
रंगबत्ती-रंगबत्ती-रंगबत्ती-रंगबत्ती-
कोनो कोलो ता हसी पदों कोहो न कोता-
हैगो लागे-लागे गोला जा लागे-
लागे लागे नहीं जावते मोता जो-
नहीं करो नहीं करो कोता...
Posted on: Dec 21, 2017. Tags: KAMTA PRASAD SONG VICTIMS REGISTER
वनांचल स्वर : बांस की लकड़ी और सन की रस्सी से बना कांवड़ आदिवासी का पिक अप वैन है...
सीजीनेट जन पत्रकारिता यात्रा आज ग्राम-अमोड़ी, ब्लाक-अंतागढ़, जिला-कांकेर (छत्तीसगढ़) में पहुँची है वहां से बाबूलाल नेटी गाँव के रामप्रसाद जी से कांवड़ बनाने के बारे में बात कर रहे है वे बता रहे हैं कि कांवड़ को बांस की लकड़ी और सन की रस्सी से बनाया जाता है और उसके बीच में टोकनी रखी जाती है और वो गाँव के लोगों के बहुत काम में आता है जैसे इसकी मदद से मिटटी, पत्थर, अनाज ये सब लम्बी दूरी तक इसमें ढो सकते है और इसको महिला पुरुष दोनों इस्तेमाल में ला सकते है यह व्यक्ति की क्षमता पर निर्भर है पर इसमें 40-50 किलोग्राम तक सामान आराम से ढो सकते है आदिवासी इलाकों में ग्रामीण अक्सर इसको बाजार भी लेकर जाते है. बाबूलाल नेटी@9713997981.
Posted on: Dec 15, 2017. Tags: RAMPRASAD ANTAGADH SONG VANANCHAL SWARA VICTIMS REGISTER
बहोत अभिमान मैं करथों छत्तीसगढ़ के माटी मा...छत्तीसगढ़ी कविता -
बोडला बाजार (छत्तीसगढ़) से मथुरा प्रसाद वर्मा छत्तीसगढ़ी में एक कविता सुना रहे हैं :
बहोत अभिमान मैं करथों छत्तीसगढ़ के माटी मा – मोर अंतस जुड़ा जाथे बटकी भर के बासी मा – ये माटी नो है ये महतारी एकर मान तुम करो – महू तरसे हों तोरे बर तहू ला तरसे ला परही – मैं केतका दुरिहा रेंगे हों तहूं ला सरके ला परही – मै तोरे नाम के चातक अभी ले प्यासा बैठे हों-
तड़प मोर प्यास मा होही ता तोला बरसे ला परही...



