चौराहे पर टंगा एक पोस्टर चिल्लाता रहा....कविता
कानपुर, उत्तरप्रदेश से के.एम. भाई एक कविता प्रस्तुत कर रहे हैं:
चौराहे पर टंगा एक पोस्टर चिल्लाता रहा-
रोजगार की गारंटी, रोजगार की गारंटी-
कमबख्त वक्त की नजाकत-
उसके नीचे मजदूरों का हुजूम भूखा खड़ा था-
कभी कभी तो ऐसे हालात आते हैं-
जब कुछ लोग सर्द रातों में खुले आसमान के नीचे सो जाते हैं-
कुछ जी जाते हैं कुछ अमर हो जाते हैं-
लोकतंत्र फटकार लगाता है और-
तमाशा करने वाले मजा लूट ले जाते हैं...
