आदिवासी भाई मनहा, मांगत हावै पट्टा: बैगा आदिवासी की कविताएं
आमा खा ले अमली खा ले, औ खा ले खट्टा
दारू गांजा जुआ खेले, औ खेलत हे सट्टा
आदिवासी भाई मनहा, मांगत हावै पट्टा
खटिया पलंग सोफा टूटगे, और टूटगे दीवान
जाती पाती के रैयत नई ए, होगे एक सम्मान
अपन लड़ाई लड़े के खातिर, भैया करबो हमन बखान
करिया करिया जाम पाके, हरिया हरिया बिही
एही दिन के आवत ले, कौन मरही कौन जीही
हमन गेन छट्टी मा, मुरगा सब्जी खाबो कहिन्
खाएल उहाँ बरबट्टी मा, हमर संगी पीयत रहे
हमना ला भट्टी मा, भैया हमन चल दी फटफट्टी मा
राम नाम सार हे, बाकी बेकार हे
सीजीनेट सार हे, बाकी बेकार हे
खाए बर राहर तिउरा दार हे
बैठे बर बांधा के पार हे
चढ़े बर मोटरगाड़ी कार हे
आ यार पटवारी तहसीलदार हे
एक रुपिया किलो में चाउर देथे
वो हमर छ्त्तीसगढ ला रमन सरकार हे
इतके बर बिजली के तार हे
सोन सिंह धुर्वे
