सुन ले ताज ए बर्तानिया...कविता
के एम भाई कानपुर (उ.प्र.) से एक कविता सुना रहे हैं, जो आतंकवाद के ऊपर आधारित हैं :
सुन ले ताज ए बर्तानिया-
आतंक की गलियों से आवाजें उठती हैं-
खून से सराबोर इस धरती पे-
एक दिन ऐसा आयेगा-
जब सब्जी की जगह इंसा बेचा जाएगा-
न मुल्क रहेगा न सिपहसलार रहेगा-
सुन ले ताजे ए बर्तानिया-
तेरे कद्रदानों के हाथों ही-
तेरा जनाजा निकाला जायेगा-
दस्तावेज ए मुल्क से-
आतंकवाद का नामो निशां मिट जाएगा-
आतंकवाद का नामो निशां मिट जाएगा...
