तोड़ो जात-पात का जाला, फोड़ो छुआछूत का छाला...जात-पात विरोधी कविता
ब्रिजेश रीवा, मध्यप्रदेश से बघेली भाषा में वर्ण व्यवस्था पर एक कविता प्रस्तुत कर रहे हैं:
देखो मक्कारों की माया,पैसा भेदभाव पनपाया-
पहले चार बाण उपराजे, भेद-प्रभेद हजारों साजे-
रक्त वही है, मांस वही है, हर धड़कन हर सांस वही है-
आँख-नाक-मुंह-कान वही है, बुद्धि-ह्रदय-मन-प्राण वही है-
फिर भी भेदभाव गहराए, बरबस ऊँच-नीच ठहराए-
काया तो फिर काया ही है, सोचना उनको छाया भी है-
कहीं न किल्लत कहीं न एका, सबको तोड़फोड़ कर फेंका-
ग्रन्थकार मक्कार हमारे, वर्णवाद के पोषक सारे-
अब इन सांपो को मत पालो, बाँध इन्हें दरिया में डालो-
चीरो इन ग्रंथों को फाड़ो, कहीं गड्ढे में गहरे डालो-
तोड़ो जात-पात का जाला, फोड़ो छुआछूत का छाला-
तुमको नया समाज बनाना, तुम्हें देश में जीवन लाना-
चाँद-सूरज न बादल-बिजली, देख-देख चौवाने-
पंप-ज्वार-विस्फोट-बवन्डर, उल्फा देख डराने-
उनके अस्त के मारा के डारिन, बड़ी-बड़ी उ पोथी-
ओनहिन् का ही बेद बतावें, महिमा गावैं थोथी-
पहिल वेद ऋग्वेद कहावै, सब बेदन के दादा-
लवरी पुड़ी गप्प-सड़ाका, ओहिन मा कुछ ज्यादा-
ऋग्वेद में वर्णवाद का, बीरबा लोग लगाइन-
बिलख-बिलख पैदाइस चारो, बर्णन केर बताइन-
ईश्वर के मुख से पैदा भा, बाभन बड़ा चिकनिया-
बांह फाड़ के ठाकुर आवा, जांघ फाड़ के बनिया-
शूद्र जन जन्मा गोडे से, लतियावइ के लाने-
अइसन बैदिक जाल बिछाइन, भरमावाइ के लाने
