तितलियां : शाहिद अख्तर की एक कविता
रात सोने के बाद
तकिये के नीचे
सिसकती हुई
आती हैं यादों की तितलियां
तितलियां पंख फडफडाती हैं
कभी छुआ है तुमने इन तितलियों को
खूबसूरत पंखों को
मीठा मीठा
सदा मस्त है उनमें
एक सुलगता सा एहसास
जो गीली कर जाते हैं मेरी आंखें
तितलियां पंख फडफडाती हैं
तितलियां उड जाती हैं
वक्त की तरह
तितलियां यादें छोड जाती हैं
खुद याद बन जाती हैं
तितलियां बचपन की तरह हैं
मासूम,खिलखिलाती
हमें अपने मासूमियत की याद दिलाती हैं
जिसे हम खो बैठे हैं जाने अंजाने
चंद रोटियों की खातिर
जीवन के महासमर में
हर रात नींद के आगोश में
जीवन के टूटते,ढहते सपनों के बीच
मैं खोजता हूं
अपने तकिए के नीचे
कुछ पल बचपन के
कुछ मासूम तितलियां
शाहिद अख्तर
