बेड़ा कइसे पार होहि रे, जिनगी के...एक छत्तीसगढ़ी गीत
साथी गोकरण सिंह वर्मा एक छत्तीसगढ़ी गीत गा रहे हैं. गीत का सन्दर्भ ये है कि आज समाज से अच्छे लोग गायब हो रहे हैं. ऐसे में समाज कैसे आगे बढेगा. अंतिम आदमी की सुध कौन लेगा, कौन इसे रास्ता दिखाएगा...
बेड़ा कइसे पार होहि रे, जिनगी के
बेड़ा कइसे पार होहि ना
नइया मझधार मा, नहीं है खेवइया
जेल पतवार संउपे, अपने देखइया
अउकोनो सवार होहि रे
बेड़ा कइसे.......
जाति-पाति, भाषा में, बंट गे सबो जन
बन गे हे भाई हा, भाई के दुश्मन
एमा कब सुधार होहि रे
बेड़ा कइसे........
संझा अउ बिहनिया चले गोली-आंधी
हँसत दुश्मन, रोवत गांधी
कइसे संसार होहि रे
बेड़ा कइसे........
सच के बोलइया हा हाट माँ बेचावत है
छल के करइया हा हवा में उड़ावत हे
कइसे उजियार होहि रे
बेड़ा कइसे.......
