हत्यारे जब बुद्धिजीवी होते हैं...
हत्यारे जब बुद्धिजीवी होते हैं
वो तुम्हे ऐसे नहीं मारते
बख्श देते हैं तुम्हे तुम्हारी ज़िंदगी
बडी चालाकी से
झपट लेते हैं तुमसे तुम्हारा यह समय
तुम्हारी यह आवाज़
तुम्हारा यह शब्द
जिसमें तुम रहते हो
तुम्हारे छोटे छोटे सुखों का
ठिकाना ढूंढ लेते हैं
ढूंढ लेते हैं तुम्हारे छोटे छोटे दुखों और उदासियों के कोनें
बिठा देते हैं पहरे
जहां जहां तुम सांस लेते हो
रचते हैं झूठ
और चढा लेते हैं उस पर
तुम्हारे ही समय
तुम्हारी आवाज़
तुम्हारे ही शब्दों के रंग रस गंध
वे तुम्हारे ही शब्दों से कर देते हैं
तुम्हारी ही हत्या
और हत्यारे जब मसीहा होते हैं
वो तुम्हे ऐसे नहीं मारते
बचा लेते हैं ढहने से
खण्डहर होते तुम्हारे सपनों की आखिरी ईंट को
किसी चमत्कार की तरह
कि तुम इन हत्यारों में ही देख सको
दैवी चमत्कार की अलौकिक कोई शक्ति
तुम्हारी जर्जरित सांसों के तार तार होने तक
वो करते रहेंगे और भी कई कई चमत्कार
कि तुम उन्हे पूज सको
किसी प्राच्य देवता की तरह
कि तुम्हारी अंतिम सांस के स्खलित होने के ठीक पहले
उनके बारे में दिया गया तुम्हारा ही बयान
अंतत: बचा ले सके उन्हें
दरिंदगी के तमाम संगीन आरोपों से
योगेन्द्र कृष्ण
