गोंडवाना की प्राकृतिक समृद्धि संस्कृति का आधार है...
गोंडवाना की प्राकृतिक समृद्धि संस्कृति का आधार है !
आदिम मानव जल जंगल जमीन और संस्कृति का वरिशदार है !
सिन्धु और हड़प्पा के मूल का सृजनहार है !
अप्राकृतिक ,काल्पनिक आस्था पर वास्तविक आस्था का प्रहार है !
प्रकृति और प्राणियों में निकली प्रेम की स्वछन्द पुकार है !
वसुंधरा के गोद में बिखरी ,सुनहरी हरियाली प्राकृतिक श्रृंगार है !
प्राकृतिक संवेदनाओं की बहती बयार भी मानवीय संस्कार है !
गाँव के कछार पर उगी हुई छुई मुई सी मुरझाती है !
पुष्प लता जल जंगल झरने पहाड़ो के संग मुस्कुराती है !
सेमल पर गूंजते भौरों और तितलियों के संग गुनगुनाती है !
लहलहाती खेत के मेड़ों में बैठ खुशी के गीत गाती है !
गलियारों में गाए के बछड़ों की तरह स्वच्छंद मचलाती है !
पनिहारिनों की ठिठोली से ताल पनघट खिलखिलाती है !
गाँव के सुबह सुनहरी धुप में मिटटी की खुशबु आती है !
किसान अपने दिन भर के परिश्रम का थकान मिटाता है !
टिंगरी मांदर के सुरताल पर चौपाल गुनगुनाता है !
रिला, सुवा , घाघरा।, शैला, कर्मा का करताल खनक जाता है !
ढोलक के थाप पर जब गीत गया जाता है !
शक्ति के श्रृंगार पर अंतस का पदभार जताया जाता है !
वानस्पतिक औषधि से सेवा धर्मं का हमने खोला खाता है !
बरसों से लेकर आज भी उसी परिवेश से हमारा नाता है !
जब चलती है संस्कृति की बयार बर पीपल अमराई से !
गाँव के मेड़ों , बूढ़ा देव, ठाकुर देव खिला गुठवा खेर बाई से !
फुट पड़ती है स्वर लहरी , मानस अंतस की गहराई से !
उठ आते हैं सारे रिश्ते नाते,पहाड़ पर्वतों की तराई से !
चरवाहे की बांसुरी धुन सुन आते हैं गाय बछड़े अमराई से !
विनती है माता रायता जम्बो ,कलि कंकालिन दाई से !
बचाए रखना इस सांस्कृतिक गर्भ को पाखंडियों की चतुराई से !
