देखादेखी में देखो हम कितने बदल गए हैं...
देखादेखी में देखो हम कितने बदल गए हैं
कि अपनी मूल पहचान से ही दूर तलक निकल गए हैं
खुद को ज्ञान का सूरज कहने वाले
हम क्यूं ढलने के लिए पश्चिम की ओर चल रहे हैं
सिर्फ बातें ही रह गई हैं हमारे सिकन्दर सी
वर्ना आदतें तो बन गई हैं बन्दर की
विदेशी रंगों में रंगा है हमारा खानपान रहन सहन पहनावा
गैरो की सभ्यता का चोला पहनकर हम हिन्दुस्तानी होने का करते हैं दावा
जुबां पर भाषा है गैरों की
क्या यही हकीकत है हम भारत के शेरों की
हमारी योग्यताएं परायों से वफा निभाने चली हैं
क्यूं कमान न सम्हाल सके हम घर की
खुद को हम सम्पूर्ण कहने वाले क्यों अधजल गगरी की तरह छलक रहे हैं
