निर्बल के प्राण पुकार रहे, जगदीश हरे जगदीश हरे...भजन सुना
पवन कुमार बिहार से एक भजन सुना रहें है:
निर्बल के प्राण पुकार रहे, जगदीश हरे जगदीश हरे-
स्वांसों के स्वर झंकार रहे ,जगदीश हरे जगदीश हरे-
आकाश हिमालय सागर ने, पृथ्वी पाताल चराचर ने-
ये मधुर बोल गुँजार रहे, जगदीश हरे जगदीश हरे-
जब दया दृष्टि हो जाती है , सुखी खेती लहराती है-
इस आस से जन ऊंचार् रहे , जगदीश हरे जगदीश हरे-
सुख – दुखो की चिंता है ही नहीं , है है विश्वाश न जाए कहीं...(181328) GT
