गोटुल में मिलकर हम समस्या निपटाते थे, पारम्परिक नेताओं की मदद से उसको पुनर्जीवित करना है...
ग्राम पचायत-पाड़ेंगा, ब्लॉक-कोयलीबेडा, जिला-उत्तर बस्तर कांकेर (छत्तीसगढ़) से मोहन यादव के साथ रैनुराम सलाम गोटुल के बारे में बता रहे है: पहले गोटुल की प्रथा थी पूरे गावं के लोगों के लिए एक मंच था गावं में जो भी समस्या होती थी वहां गाँव के सभी लोग उस गोटुल में बैठ कर समस्या का समधान करते थे | लेकिन आज पहले जैसे गोटुल नहीं रहे, गोटुल का पहले जैसा संस्कृति रीति रिवाज की जो प्रथा थी वो धीरे-धीरे लुप्त होते जा रही है आज हमे लगता है हम पढ़े लिखे हो गये हैं. जरूरत है कि हम अपनी मूल संस्कृति को गोटुल में बैठ कर चर्चा करे, जिससे हमारी भाषा संस्कृति की सुरक्षा बनी रहे | इसलिए अभी गाँव के पारम्परिक नेता जैसे पटेल, गुनिया, मांझी ये सभी मिल कर अभी गोटुल प्रथा को बचाने का प्रयास कर रहे हैं...
