बेरोजगारी इतनी है कि मैं ट्रेन में किताबें बेचकर किसी तरह अपना जीवन चलाता हूँ संतुष्ट हूँ...
जिला-अनूपपुर (मध्यप्रदेश) से रेल यात्रा के दौरान मिले पुनुर सिंह सीजीनेट स्वर के साथी बाबूलाल नेटी को बता रहे हैं कि वे धार्मिक पुस्तक बेचने का काम करते हैं, इसके लिए वे दुकान लगाते हैं, इसके अलावा ट्रेन में लोगो के पास जाकर भी पुस्तक बेचते हैं, इसी से उनका जीवन यापन हो रहा है, और वे इससे संतुष्ट हैं, वे कह रहे हैं कि इस प्रकार बेरोजगारी इतनी है कि लोग कुछ न कुछ कर के अपना जीवन जीते है, लेकिन इससे वे केवल अपने अपने जीने खाने की जरूरतों को पूरा करने के अलावा और कुछ नहीं कर पाते. ऐसे ही उनकी तरह बहुत से लोग हैं जो कोई छोटा मोटा काम करते हैं और अपना और अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं
