ग्रामीण महिला का गीत... हममें भी जीने की एक आस है ...
चकिये -चूल्हे और खेती- बड़ी से भी आंगे एक जहाँ है
घर की चार दिवारी और बच्चो की पहेरदारी से भी अलग एक जहाँ है
जख्म और पीड़ाओ से दूर प्यार और दुलार का भी एक जहाँ है
पर्दा और घूँघट से भी अलग इंसानों का एक जहाँ है
दहेज़ और हिंसा से हटकर भी रिस्तो का एक जहाँ है
बहु और पत्नी से हटकर भी औरत का एक और जहाँ है
घुटन और जलालत से भी आंगे एक खुला आकाश है
आजाद पंक्षियों की तरह उड़ने और खुली हवा में साँस लेने की भी एक प्यास है
हम ग्रामीण महिलाओ में भी जीने की एक आस है ...
हम ग्रामीण महिलाओ में भी जीने की एक आस है ...
के. एम् भाई
08756011826
