न कभी गाँधी मरता है, न कभी राम...कविता -
कानपुर (उत्तरप्रदेश) से के एम भाई आज के हालात में धर्म से सम्बंधित एक कविता सुना रहे है:
राजनीति की आंच में-
झुलसता लोकतंत्र-
न कभी गाँधी मरता है-
न कभी राम-
बस मेरा शहर-
यूँ ही जलता है-
कल ही मैंने धर्म को मारा था-
पर ये क्या-
कमबख्त आज फिर पैदा हो गया-
कल ही मैंने राख बटोरी थी
पर ये क्या-
आज फिर मेरा घर जल गया-
ये आग भी बड़ी जालिम है-
जरा सी आंच में ही-
भड़क जाती है-
धुंआ कहीं और उठता है-
और दुनिया मेरी उजडती है-
लोकतंत्र भी बड़ा अभागा है-
महान होकर भी-
महान नहीं बन पाता-
मुक्त होकर भी-
दासता का जीवन बिताता...
