क्या हमें ये आज़ादी मिलेगी...एक कविता
क्या हमारी उन निर्दोष बच्चियों को जिन्हें जन्म से पहले ही मार दिया जाता है इस समाज में जन्म लेने की आज़ादी मिलेगी
क्या हमारी उन मासूम कन्याओ को जो अपने ही जन्मदाता की हवस का शिकार होती है अपना बचपन जीने की आज़ादी मिलेगी
क्या हमारी उन नौजवान बेटियों को जिन्होंने अपने युवा जीवन में कदम ही रखा है मानवी भीड़ के बीच अपने को सुरक्षित महसूस करने की आज़ादी मिलेगी
क्या हमारी बेटियों के परदे में ढके जिस्म को लेजर किरणों की तारह तरेसती नंगी हवसी आँखों से आज़ादी मिलेगी
क्या हमारी बेबस और कमजोर महिलाओ को दहेज़ और घरेलू हिंसा जैसे दानवी प्रथाओ से आज़ादी मिलेगी
क्या हमारी उन ग्रामीण महिलाओ को जो आज भी चकिये – चूल्हे में ही कैद है आधुनिक समाज में घूमने की आज़ादी मिलेगी
क्या हमारी उस बूढी माँ को जो भूख और इलाज से लाचार है एक मुठ्ठी अनाज और एक खुराक दवा निशुल्क प्राप्त करने की आजादी मिलेगी
क्या हमारे समाज को उन प्रायोजको और दर्शको से, जो परदे पर सिर्फ औरत के नंगे जिस्म को देखना चाहते है आज़ादी मिलेगी
क्या हमारी भारत माता को छेड़छाड़, हिंसा, बलात्कार, प्रताड़ना, शोषण, भुखमरी, अशिक्षा, दासता, वासना आदि कलंको से आज़ादी मिलेगी
क्या हमारी बहन बेटियों और माताओ को उनकी वास्तविक आज़ादी मिलेगी
हमें इंतजार है ...
हमें इंतजार है ...
कृष्ण मुरारी यादव
