हर एक दिन नर्इ बाते नया संदेसा लाता है...एक कविता
हर एक दिन नर्इ बाते नया संदेसा लाता है।
कर्इ परेशानी कर्इ नर्इ राह दिखलाता है।
एक पन्ने में दर्द और खुशहाली कहानी है
और दूसरा पन्ना फिर खुल जाता है।
ऐसे लगता है जैसे दिन आता है और जाता है।
आसमान में तारे कितने, किसको समेटूँ ये समझ नही आता है।
उतनी ही समस्या लगती जीवन में, कैसे मिटाऊँ मन मेरा घबराता है।
एक मकड़ी का जाल है दुनिया, कोर्इ फसे कोर्इ निकल जाता है।
किसी को बहुत खुशी है तो किसी को बहुत हताशा है ।
कोर्इ बताओं मुझे, क्या जीवन की परिभाषा है।
बस मुझे जानने की यही अभिलाषा है।
अनिल बामने
