ये बिकते हैं वो बिकते हैं,तक्षक के कमान बिक जाते हैं...कविता -
ग्राम-रजवाड़ा, थाना-साहेबगंज, जिला-मुजफ्फरपुर (बिहार) से विजय प्रकाश लोकप्रिय एक स्वरचित कविता सुना रहे हैं :
ये बिकते हैं वो बिकते हैं,तक्षक के कमान बिक जाते हैं-
बेचने वाले क्या नहीं बेचते पूरे हिंदुस्तान बिक जाते हैं-
आन बिकते हैं मन बिकते हैं मानव का सम्मान बिक जाते हैं-
बेचने वाले क्या नहीं बेचते यहाँ तो इंसान बिक जाते हैं-
मंदिर बिकते हैं,मस्जिद बिकते हैं, उसमे स्थित भगवान् बिक जाते हैं-
बेचने वाले क्या नहीं बेचते साधू,भगवान बिक जाते हैं-
प्राण बिकते हैं निशान बिकते है किसी गरीबों का कत्लेआम बिक जाते हैं-
बेचने वाले क्या नहीं बेचते मानवता का प्रमाण बिक जाते हैं-
शान बिकते हैं सम्मान बिकते है,बेचने वाले क्या नहीं बेचते-
इंसानियत का फरमान बिक जाते हैं-
धन बिकते हैं तन बिकते हैं सोने का खान बिक जाते हैं-
बेचने वाले क्या नहीं बेचते देश का आर्थिक लगान बिक जाते हैं-
अमीन बिकते हैं,जमीन बिकते हैं,खया की गिरेबान बिक जाते हैं-
बेचने वाले क्या नहीं बेचते गरीबों का दालान बिक जाते हैं-
मन बिकते हैं,तन बिकते हैं ,गरीबों का शरन बिक जाते हैं-
बेचने वाले क्या नहीं बेचते धोबी का चाँद बिक जाते हैं-
मांग बिकते हैं समांग बिकते हैं राजगद्दी का टांग बिक जाते हैं-
बेचने वाले क्या नहीं बेचते जनता का अरमान बिक जाते हैं-
ये बिकते हैं वो बिकते हैं,गद्दारों के ईमान बिक जाते हैं-
बेचने वाले क्या नहीं बेचतेहैवानो से हिंदुस्तान बिक जाते हैं-
