नित-नित जीना, नित-नित मरना सबकी यही कहानी है...कविता
ग्राम-तमनार, जिला-रायगढ़, (छत्तीसगढ़) से कन्हैयालाल पडियारी एक कविता सुना रहे हैं:
नित-नित जीना, नित-नित मरना सबकी यही कहानी है-
ढोल मृदंग से सूर्य निकलता मै भी कभी अभिमानी था-
अब देखो मेरा बुरा हाल रोज तुम्ही से खूब पिटता हूँ-
पिटा-पिटाकर भी तुमसे तुम्हारा मन बहलाता हूँ-
तुम गाते हो सुर लगाकर मई भीतर-भीतर रोता हूँ-
मै भी था कभी तुम जैसा जिन्दा-
अब तो ढोल मृदंग कहलाता हूँ-
करो न गुमान तुम भी मुझ जैसा...
