वोट और नोट के खेल में...कविता
वो मजहबी रंग की बात करते है-
पर इंसानी मजहब की बात नहीं करते-
वो निवेश और विनिमेश की बात करते है-
पर लोकतंत्र की बात नहीं करते-
वो लहू के रंग की बात करते है-
पर संबंधो की बात नहीं करते-
वो नफरत और टकराव की बात करते है-
पर एकता और विश्वास की बात नहीं करते-
वो इंसानी जात की बात करते है-
पर इंसानियत की बात नहीं करते-
वो आंसू बहाने की बात करते है-
पर ख़ुशी बांटने की बात नहीं करते-
वो टकराव और उन्माद की बात करते है-
पर हाथ जोड़ने की बात नहीं करते-
वो राज और राजनीति की बात करते है-
पर सबके विकास की बात नहीं करते-
वो वोट और नोट में खेल की बात करते हैं-
पर इंसानी हक़ की बात नहीं करते-
वो सियासी दांव पेच की बात करते है-
पर इंसानी विशवास की बात नहीं करते-
इंसानी विशवास की बात नहीं करते...
